सिद्धनाथ महादेव मंदिर,नेमावर,मध्यप्रदेश

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सिद्धनाथ महादेव मंदिर प्राचीनकाल से ही शिवभक्तों की आस्था का केंद्र बना हुआ है। यह नेमावर का सर्वाधिक प्राचीन एवं सही सलामत मंदिरों में से एक है। पौराणिक संदर्भ में देखे तो इसके निर्माण को लेकर कई मत उभर कर आते हैं। वशिष्ठ संहिता के अनुसार यहां के शिवलिंग की स्थापना ब्रह्माजी के मानस पुत्र सनकादिक ऋषियों ने की थी। स्कंद पुराण में भी इस मंदिर का वर्णन है। पद्मपुराण में बताया गया कि यह स्वयंसिद्धा शिवलिंग है। इसकी पूजा से विष्णु लोक की सहज प्राप्ति होती है। रेवाखंड के 1362वें श्लोक में वर्णित है कि यहां अभिषेक करने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है। महाभारतकाल से भी इस मंदिर का नाता जोड़ा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण कौरव ने एक रात में किया था। यह मंदिर पूर्वाभिमुख था, जिसे महाबली भीम ने अपनी भुजाओं के बल से पश्चिम की ओर घुमाकर अपना अधिकार जमा लिया था। सच क्या है यह तो शोध का विषय है, लेकिन मंदिर बगैर नींव का है। इसकी पुष्टि वर्षों पूर्व उत्खनन में हुई थी। इतिहास के आईने में झांककर देखे तो इस बात की पुष्टि होती है कि मंदिर का मौजूदा स्वरुप 11वीं सदी में परमार राजाओं द्वारा प्रदान किया गया है, जबकि मंदिर के सभागृह एवं महामंडप का निर्माण सन 1220 से 1260 के दौरान बंजारा राजाओं द्वारा किया गया था। धर्मशाला का निर्माण माता अहिल्या के हाथों होना पाया गया है। यह मंदिर उत्तरभारत के उत्कृष्ट मंदिरों में से एक है तथा भूमिज मंदिरों के अंतर्गत आता है।तीन खंडों में है मंदिरमंदिर तीन खंडों में होना बताया जाता है मंदिर का भू गर्भ स्तर महाकालेश्वर खंड है, जिसका मार्ग भैरव गुफा से होकर जाता है जो वर्तमान में नर्मदा की बाढ़ की वजह से आने वाली मिट्टी से भर जाने के कारण अवरुद्ध है। जिस शिवलिंग का पूजन होता है, वह भूतल में स्थित होकर सिद्धनाथ लिंग कहलाता है। मंदिर के ऊपरी भाग में तृतीय खंड ओमकार लिंग के नाम से जाना जाता है। इसके दर्शन किए जा सकते हैं, किंतु सीढ़यिों के अभाव में आमभक्तों के लिए ऊपर जाकर दर्शन करना बहुत कठिन है। मंदिर पाषाण से निर्मित है तथा इसकी ऊंचाई भूतल से करीब 80 फीट है। मंदिर के निर्माण में बालू निर्मित पत्थरों का उपयोग किया गया है। मंदिर के आंतरिक एवं बाह्य भाग में विभिन्न देवी-देवताओं, गण-गणिकाओं की मूर्तियों का अंकन किया गया है।शिवलिंग से फूटी थी रक्त व जल की धारायह मंदिर भी मुस्लिम लुटेरे औरंगजेब के मूर्ति भंजन के उन्मादी दौर का शिकार हुआ है। समूची मूर्तियों के साथ मंदिर का शिवलिंग्रभी मूर्ति भंजन के प्रहार से अछूत नहीं रहा। यह बात अलग है कि खंडित शिवलिंग पूजित नहीं होता है, परंतु यहां प्रमाणिकता के आधार पर इस शिवलिंग का पूजन-अर्चन होता आया है। कहा जाता है कि मूर्ति पर प्रहार के बने तीन निशानों से रक्त एवं जल की धाराएं फूटी थी। इससे यह प्रमाणिक शिवलिंग के रुप में मान्यता प्राप्त है। इस वजह से इसका सदियों से पूजन किया जाता रहा है एवं जाता रहेगा। दूसरे प्रमाण के रुप में शिवलिंग पर अभिषेक किए जाने पर ओंकार ध्वनि स्पष्ट सुनाई पड़ती है। कई लोगों ने्रओंकार ध्वनि का श्रवण कर अपने को धन्य महसूस किया है।हर हर महादेव…

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